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कितना कारगर होगा यह सफर – is it making a difference?

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कितना कारगर होगा यह सफर - is it making a difference?
Aditya Chaudhary

सुबह के करीब 6.30 बजे हैं. मगर दो एकड़ के इस मैदान में अब भी अंधेरा है. यह जालंधर जिले में आदमपुर का काला बकरा गांव हैं. यहां कांग्रेस पार्टी की भारत जोड़ो यात्रा का शिविर लगा है. ग्रामीणों की हलचल अभी शुरू नहीं हुई है, पर करीब सौ ट्रक कंटेनरों के जमावड़े के साथ सटे शिविर उजली रोशनी से जगमगा रहे हैं. यहां चहल-पहल अपने शिखर पर है. पार्टी का सेवा दल संगठन राष्ट्रीय ध्वज फहराने के लिए आ जुटा है.

इसके बाद वे राष्ट्रगान और फिर वंदे मातरम गाते हैं. फिर वे छोटे-छोटे जत्थों में बंटकर कांग्रेस महासचिव और राज्यसभा सदस्य जयराम रमेश की अगुआई में जालंधर-दसूआ हाइवे पर रवाना हो जाते हैं. आधे घंटे बाद पौ फटते ही 2 डिग्री सेल्सियस के कंपकंपाते जाड़े में महज आधी बांह की सफेद टी-शर्ट, हाइकिंग पैंट और स्नीकर पहने और चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ राहुल गांधी उसी रास्ते पर तेजी से रवाना हो जाते हैं.

उनके पीछे 200 से ज्यादा यात्रियों का हुजूम है, जिनमें से कई हाथों में तिरंगा और कांग्रेस पार्टी का झंडा थामे हैं. पीछे-पीछे स्थानीय कांग्रेसजनों की तरफ से जुटाया गया कारों और ट्रकों का काफिला चल पड़ता है, जिससे बैनर लहराए जा रहे हैं और तेज आवाज में पंजाबी के लोकप्रिय गाने बज रहे हैं. सड़कों के दोनों ओर कतार से पैदल चलते राहुल के कट-आउट लगे हैं और पोस्टर भी, जिनमें वे भगवा रंग की सिख पगड़ी बांधे हैं. यात्रियों की अगवानी में भागंड़ा भी किया जा रहा है.

इतनी सुबह होने के बावजूद आदमी, महिलाएं और यहां तक कि बच्चे भी राहुल की झलक पाने के लिए कतार में हैं. उनका ध्यान खींचने के लिए वे जोर-जोर से हाथ हिला रहे हैं. कांग्रेस के नेता कभी-कभार उनमें से कुछ को अपने साथ जुड़ने के लिए बुला लेते हैं, बच्चों को मिठाई देते हैं और उनके मम्मी-पापा से गपशप करते हैं. इनमें 16 बरस की सुकृति भी है जो प्री-बोर्ड परीक्षा छोड़कर इसलिए आई है ताकि कांग्रेस के समर्थक अपने दादी-दादा की तस्वीर पर राहुल के दस्तखत ले सके, पर ले नहीं पाई.

वकील 30 वर्षीया निकिता सोनवाने और 28 वर्षीया मृणालिनी रवींद्रनाथ भी हैं, जो भोपाल से राहुल को अपने उस अभियान के बारे में बताने आई हैं जो वे कई राज्यों में तेजी से फैल रहे और किसानों की फसल बर्बाद कर रहे संरक्षित जंगली सूअरों को मारने की इजाजत के लिए चला रही हैं. चलते और लोगों की तरफ हाथ हिलाते राहुल उन्हें गौर से सुनते हैं. चार घंटे चलने के बाद यात्रा थोड़ी देर के विराम के लिए ठहर जाती है और दोपहर 3 बजे चार घंटों के लिए फिर रवाना हो जाती है और इस तरह दिन में कुल 28 किलोमीटर का रास्ता तय करती है. यात्री रात के खाने और रात भर विश्राम के लिए शिविरों में चले जाते हैं ताकि अगली सुबह फिर निकल सकें.

यह भारत जोड़ो यात्रा (बीजेवाइ) का 122वां दिन है और रमेश बताते हैं कि वे अब तक 12 राज्यों में करीब 3,000 किलोमीटर की दूरी तय कर चुके हैं. 7 सितंबर को कन्याकुमारी से शुरू हुई यात्रा 30 जनवरी को जब श्रीनगर में खत्म होगी तो राहुल और उनके साथ चल रही टोली 146 दिनों में 13 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश से गुजरते हुए 3,200 किमी से ज्यादा का सफर कर चुके होंगे. यह उस शानदार यात्रा का शिखर होगा जिसने इन महीनों के दौरान राहुल गांधी को भारतीय राजनीति के केंद्रीय मंच पर वापस स्थापित किया है.

उनके यूट्यूब वीडियो को सितंबर से बीजेवाइ की रोज की प्रगति बताने के लिए पोस्ट करना शुरू करने के बाद हर महीने औसतन 2.1 करोड़ नए व्यूज मिले. अपने 138 साल के राजनैतिक वजूद के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी मरणासन्न कांग्रेस में यात्रा ने कई और तरीकों से भी ऊर्जा का संचार किया. स्वतंत्र भारत में अभूतपूर्व पैदल राजनैतिक कवायद यह यात्रा अब जब पूरी होने जा रही है, पार्टी के समर्थक और आलोचक दोनों सवाल पूछ रहे हैं—क्या इस यात्रा से वह फर्क पड़ा है, जिसकी कांग्रेस को अपनी राजनैतिक तकदीर फिर से चमकाने के लिए जरूरत है?

रसातल की तरफ झांकें
इस सवाल का निर्णायक जवाब तो 2023 में होने वाले नौ राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद ही मिलेगा. इनमें कर्नाटक और मध्य प्रदेश के अहम चुनाव भी हैं जहां कांग्रेस सत्ता में वापसी की उक्वमीद कर रही है और राजस्थान तथा छत्तीसगढ़ भी, जहां उसे सत्ता बनाए रखनी है. राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर अपनी हनक फिर हासिल करने और राजनैतिक गुमनामी की ओर अपने ढलान को रोकने के लिए कांग्रेस का इन राज्यों में जीतना बेहद जरूरी है.

उसकी कुल हालत इतनी बदतर कभी नहीं थी जितनी अब है. उसकी दुर्दशा 2014 और 2019 के आम चुनावों से शुरू हुई जब 543 सदस्यों की लोकसभा में उसके सांसदों की गिनती आजादी के बाद पहली बार घटकर क्रमश: 44 और 52 पर आ गई. 2019 की हार का जिम्मा राहुल गांधी ने अपने सिर लिया और जल्द ही कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा देकर लंबे वक्त के लिए कोपभवन में चले गए. फिर पार्टी छोड़कर जाने वालों का तांता लग गया, जिनमें सबसे अहम ज्योतिरादित्य सिंधिया थे, जो मार्च 2020 में समर्थकों के साथ भाजपा में गए और मध्य प्रदेश में कमलनाथ की अगुआई वाली साल भर पुरानी कांग्रेस सरकार को गिरा गए.

उस साल पार्टी के भीतर असंतोष भी बढ़ा, जिसकी परिणति उस चिट्ठी में हुई जो जी-23 कहलाने वाले पार्टी के 23 बड़े नेताओं के गुट ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को लिखी थी. उन्होंने गांधी परिवार की सत्ता को खुलेआम चुनौती देते हुए नए कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव करवाने की मांग की. उसके बाद तो पार्टी धंसती ही चली गई. यात्रा की पूर्वसंध्या पर उसकी सरकार महज दो राज्यों—राजस्थान और छत्तीसगढ़—में थी और एक राज्य—झारखंड—में वह सरकार में जूनियर पार्टनर थी. 2022 में एक के बाद एक राज्य विधानसभाओं के चुनाव में उसका प्रदर्शन निराशाजनक रहा.

गुजरात के चुनाव में उसके विधायकों की संख्या 77 से घटकर 17 पर आ गई और उत्तर प्रदेश में सूपड़ा साफ हो गया, जहां वह प्रियंका गांधी के जोशो-खरोश से प्रचार करने के बावजूद 403 में से महज दो सीटें जीत सकी. असम, उत्तराखंड और गोवा में कांग्रेस भाजपा को फिर सत्ता में आने से नहीं रोक सकी. इससे भी बदतर यह कि वह पंजाब आम आदमी पार्टी (आप) के हाथों गंवा बैठी, जिसने कांग्रेस को धूल-धूसरित करके भारी बहुमत से यह सरहदी राज्य जीत लिया. एकमात्र सांत्वना साल के आखिर में मिली जब उसने हिमाचल प्रदेश जीता.

2014 में भाजपा के हाथों केंद्र की सत्ता गंवाने के बाद से पार्टी की किस्मत या बदकिस्मती का निचोड़ पेश करते हुए रमेश कहते हैं, ”2014 से 2019 तक कांग्रेस पार्टी रसातल की तरफ ताक रही थी. 2019 के बाद रसातल हमें ताक रहा था. सुरंग के छोर पर हमें कोई रोशनी नजर नहीं आ रही थी.’’ मई 2022 में उदयपुर में आयोजित चिंतन शिविर में कार्यवाहक अध्यक्ष सोनिया गांधी ने ऐलान किया कि पार्टी देश भर की यात्रा निकालेगी, जिसे रमेश ”आखिरी पांसा फेंकना’’ कहते हैं. पार्टी ने इसे अपने अभी-नहीं-तो-कभी-नहीं लम्हे के तौर पर देखा.

आलोचकों ने इसे आलाकमान के राहुल को फिर चर्चा के केंद्र में लाने के एक दांव की तरह देखा. खासकर इस वक्त जब पार्टी की अध्यक्षता दो दशकों में पहली बार एक गैर-गांधी को सौंप दी गई है, फिर भले ही 81 वर्षीय मल्लिकार्जुन खड़गे को परिवार के वफादार के तौर पर ही देखा जाता हो. रमेश इस बात से पुरजोर इनकार करते हैं कि यात्रा की परिकल्पना राहुल गांधी की छवि चमकाने के लिहाज से की गई थी. वे कहते हैं, ”यह यात्रा का मकसद नहीं था, बल्कि उसका एक नतीजा है.’’

सवाल उठता है कि यात्रा की अगुआई के लिए नेताओं के समूह के बजाय राहुल गांधी को क्यों चुना गया. जवाब कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता, राज्यसभा सांसद और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह देते हैं, जो 75 की उम्र के होने के बावजूद ज्यादातर दूरी राहुल के साथ पैदल चले, ”राहुल क्यों नहीं? सोनिया गांधी और राहुल के अलावा एआइसीसी के कितने पूर्व अध्यक्ष हैं? खड़गे या सोनिया जी की उम्र को देखते हुए आप उनसे पूरी दूरी पैदल चलने की उम्मीद नहीं कर सकते. दूसरे बड़े नेताओं के पास भी पैदल चलने का विकल्प था और उनमें से कई अपने-अपने राज्यों में चले भी.’’

राहुल गांधी की री-ब्रांडिंग
भारत जोड़ो यात्रा वाकई कांग्रेस का जहाज पूरी तरह डूबने से रोकने की दिशा में एक बड़ा और साहसिक कदम तो है ही, इसके साथ ही यह पार्टी में गांधी परिवार, खासकर राहुल गांधी का प्रभुत्व स्थापित करने का एक प्रयास भी है. वे औपचारिक तौर पर 2004 में राजनीति में आए जब उन्होंने परिवार का सुरक्षित गढ़ मानी जाने वाली अमेठी सीट से चुनाव जीता. उसके बाद से उनका राजनैतिक करियर उतार-चढ़ावों से भरा रहा है, जिसने शिखर छूने की तुलना में नीचे फिसलना अधिक देखा.

2009 के आम चुनाव में राहुल गांधी अपने पैरों पर खड़े नजर आए, जब उनकी मदद से कांग्रेस उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 21 जीतने में सफल रही, जो पार्टी पिछले दो दशकों में नहीं कर पाई थी. उसने कांग्रेस को कुल 206 सीटें हासिल करने के साथ यूपीए को केंद्र में सत्ता बनाए रखने में सक्षम बनाया. लेकिन यूपीए-2 सरकार के दौरान मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल में शामिल होने को लेकर राहुल की हिचकिचाहट साफ दिखी और 2014 के आम चुनाव में उन्हें और पार्टी को इसकी भारी कीमत भी चुकानी पड़ी. यहीं से राहुल के बारे में धारणा बनने लगी कि वे कोरे वारिस हैं, जो वास्तव में किसी उपलब्धि की बजाए अपनी सियासी विरासत के बलबूते यहां तक पहुंचे हैं, और भाजपा ने उन्हें अभद्र तरीके से ‘पप्पू’, ‘शहजादा’ और राहुल बाबा कहकर चिढ़ाना शुरू कर दिया.

2018 में राहुल की किस्मत एक बार फिर चमकी, जब बतौर कांग्रेस अध्यक्ष मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पार्टी की जीत के साथ वे अपनी साख बनाने में कामयाब रहे, लेकिन 2019 के आम चुनाव आते-आते सब धराशायी हो गया. हालांकि, राहुल ने हार की जिम्मेदारी ली और अध्यक्ष पद छोड़ दिया. लेकिन, अपनी एक छोटी-सी मंडली पर भरोसा करते हुए अनौपचारिक तौर पर पार्टी प्रमुख की तरह ही काम करते रहे.

वे अपनी ही पार्टी और पार्टी के लोगों के लिए अजनबी बन गए, उनकी छवि एक एकांतप्रिय और पहुंच से बाहर वाले नेता की बनने लगी, जो कभी भी अचानक विदेश प्रवास पर चला जाता है और पार्टी के बुजुर्ग नेताओं के साथ सहज नहीं है. धीरे-धीरे हालत यह हो गई कि युवा वर्ग के जिन नेताओं को उन्होंने आगे बढ़ाया था, वही उनका साथ छोड़ने लगे. चाहे वे सिंधिया हों, जितिन प्रसाद, सुष्मिता देव हों या फिर आर.पी.एन. सिंह. और फिर ऐसा लगा कि सियासी मैदान में राहुल पूरी तरह चूक गए हैं.

भारत जोड़ो यात्रा उनके लिए खोई जमीन हासिल करने में मददगार रही है. रोज आठ घंटे की पदयात्रा के दौरान हजारों लोगों के साथ खुलकर मिलते-जुलते उन्होंने जनता से सीधा जुड़ाव स्थापित किया है. लोगों से बातचीत की उनकी तस्वीरें फोन या टेलीविजन स्क्रीन के माध्यम से लाखों लोगों तक पहुंच रही हैं. बारिश हो या धूप या फिर कड़ाके की ठंड, वे जनसभाओं को संबोधित करने से नहीं चूके.

दरअसल, राहुल ने भारत जोड़ो यात्रा का हिस्सा रहे अधिकांश राज्यों में प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया, जहां वे पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हैं, और इसके जरिए एक तरह से यह भी रेखांकित करते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले नौ साल से सत्ता में होने के बावजूद कभी ऐसा नहीं किया. प्रधानमंत्री के एकतरफा संवाद को प्राथमिकता देने पर कटाक्ष करते हुए कांग्रेस के एक प्रवक्ता ने कहा, ”मोदी अपने मन की बात बताते हैं, जबकि राहुल लोगों के मन की बात सुनते हैं.’’

यही नहीं, राहुल की टीम ने भाजपा को उसके ही खेल में मात देते हुए आक्रामक सोशल मीडिया अभियान भी छेड़ रखा है, जिसकी वजह से हर जगह उनकी मुस्कुराती और लोगों से बातचीत करने वाली तस्वीरें छाई हुई हैं. हाथ हिलाना, उत्साहित आम लोगों को गले लगाना, छोटे बच्चों को गोद में उठा लेना, पार्टी के स्थानीय नेताओं को कुछ समय के लिए पदयात्रा में अपने साथ लेकर चलना, ये कुछ ऐसी छोटी-छोटी बातें हैं जिनसे उन्होंने लोगों के बीच खासी लोकप्रियता हासिल कर ली है.

पूरे देश की खाक छानने की अपनी क्षमता, धैर्य और सहनशीलता का परिचय देकर राहुल ने एक ऐसे व्यक्ति की छवि को पीछे छोड़ दिया है जो अधीर, व्यग्र और बेक्चयाली में खोया माना जाता था. यही नहीं, उन्होंने हरियाणा में एक रिपोर्टर के एक सवाल पर यह तक कह डाला कि ”आपके दिमाग में जो राहुल गांधी है, उसे तो मैंने मार दिया है, वह मेरे दिमाग में है ही नहीं.’’ ‘पुनर्जन्म’ लेने वाले राहुल, बढ़ी दाढ़ी आदि के साथ गुजरे जमाने के एंग्री यंग मैन से ज्यादा मसीहा लगते हैं.

वे अब भी मोदी सरकार के खिलाफ बोलते समय शब्दों में कोई कसर नहीं रहने देते लेकिन सुर एकदम तपस्वी जैसा होता है, जैसा उन्होंने खुद के बारे में कहा भी, वे एक ऐसे इंसान हैं जो समाज की भलाई के लिए किसी भी बलिदान को तैयार हैं. दिल्ली में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज (सीपीएस) में राजनीति विज्ञान की प्रोफेसर रह चुकीं सुधा पै कहती हैं, ”राहुल गांधी अब अधिक परिपक्व और आत्मविश्वास से भरे नेता नजर आते हैं.

उनके कई भाषण दर्शाते हैं कि वे देश की जरूरतों को समझने लगे हैं. इससे पहले, यह सब भाजपा पर हमला करने तक ही सीमित था.’’ जेएनयू की पूर्व प्रोफेसर जोया हसन का भी मानना है कि भारत जोड़ो यात्रा ने लोगों को असली राहुल गांधी को जानने का मौका दिया है, कोई है जो यह सब खत्म करना चाहता है, कोई तो है जो उन मूल्यों में भरोसा करता है जिस पर भारत की नींव टिकी है, न कि भाजपा और मीडिया की तरफ बनाई गई पप्पू जैसी छवि का.

विचारधाराओं की लड़ाई
राहुल जो संदेश दे रहे हैं, वह कांग्रेस के लिए भी बेहद अहम हैं. इसमें उनका चिरपरिचित वाक्यांश शामिल है—’नफरत के बाजार में मोहब्बत की दुकान खोल रहा हूं.’ यात्रा आगे बढ़ाने के साथ राहुल ने मोदी, भाजपा और उसके वैचारिक संरक्षक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को तीन अहम मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने पर बाध्य कर दिया है. पहला तो आर्थिक मोर्चा है, जिसमें राहुल आर्थिक गैर-बराबरी, रोजगार की कमी, महंगाई और क्रोनी कैपिटलिज्म जैसे मुद्दों को उठा रहे हैं.

दूसरा है सामाजिक मुद्दा, जिसमें भाजपा और आरएसएस की तरफ से देश के ध्रुवीकरण के लिए धर्म, जाति और यहां तक कि लोगों के पहनावे का इस्तेमाल करने को भी रेखांकित किया जा रहा है; और तीसरा बड़ा मुद्दा राजनैतिक तानाशाही का है, जिसमें न्यायपालिका पर हावी होना और विरोधियों से प्रतिशोध के लिए प्रवर्तन एजेंसियों का दुरुपयोग करना शामिल है. राहुल ने रमेश के समक्ष यह भी स्पष्ट कर दिया है कि प्रत्येक मुद्दे पर कितना फोकस करना है—अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों को 50 प्रतिशत, सामाजिक मुद्दों को 30 प्रतिशत और राजनैतिक मुद्दों को 20 प्रतिशत तरजीह दी जानी है.

शुरुआत से ही राहुल स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत जोड़ो यात्रा कोई ‘चुनाव जीतने की यात्रा’ या ‘बेरोजगारी हटाने की यात्रा’ नहीं है जैसा कि एक सहयोगी ने कहा, दरअसल यह दो परस्पर विरोधी विचारधाराओं के बीच लड़ाई जीतने से जुड़ी है. राहुल के मुताबिक, भाजपा और आरएसएस से प्रेरित लोग धर्म और भाषा की एकरूपता पर जोर देने के साथ देशभर में जबरन नफरत, और विभाजनकारी विचारधारा थोपने की कोशिश करते हैं. लेकिन वे ऐसी विचारधारा के हिमायती हैं जो देश की विविधता में एकता, सद्भावना और समानता को सहेजने वाली प्राचीन संस्कृति से प्रेरित है.

उन्हें जानने वाले कहते हैं कि यह विचारधारा राहुल के व्यक्तित्व से काफी मेल खाती है. वे हमेशा दिन-प्रतिदिन की राजनीति की हड़बड़ाहट या विवाद सुलझाने वाले की भूमिका निभाने से असहज रहे हैं, जबकि अधिकांश नेता इसमें माहिर होते हैं. दरअसल, राहुल ने महसूस किया कि कांग्रेस ने सिर्फ और सिर्फ सत्ता हासिल करने की कोशिश में चुनावी मशीन बनकर विचार और विचारधाराओं के मोर्चे पर भाजपा और आरएसएस को जड़ें जमाने का मौका दे दिया.

उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण यही था कि देश को जिन मुद्दों का सामना करना पड़ रहा है, कांग्रेस उन पर अपनी रणनीतिक अस्पष्टता की स्थिति से बाहर आकर ठोस रुख अपनाए और अपनी वैचारिक प्रेरणा बढ़ाए. एक दशक में राहुल ने मुख्यत: किसानों के हितों और अधिकारों को लेकर आधा दर्जन छोटी-मोटी यात्राएं की हैं, और इसने ही उनके मन में राष्ट्रीय यात्रा शुरू करने की इच्छा जगाई जो उन्हें सीधे जनता से जोड़ सके. बकौल जयराम, लगता है उन्हें फ्रांसीसी दार्शनिक अल्बर्ट कामू और नेल्सन मंडेला से प्रेरणा मिली है. ”मेरे आगे न चलो. शायद मैं पीछे न चल सकूं. मेरे पीछे न चलो, शायद मैं अगुआई न कर पाऊं. मेरे साथ चलो और मेरे दोस्त बनो.’’

यात्रा में शामिल रहे पूर्व चुनाव विश्लेषक और स्वराज इंडिया के संस्थापक योगेंद्र यादव का मानना है कि ”अगर यह यात्रा न निकलती, तो पूरा माहौल निराशा और लाचारी भरा होता, मोदी और भाजपा-विरोधी ऊर्जा बिखर चुकी होती और वैचारिक स्तर पर इस शासन के खिलाफ विरोध की भावना पूरी तरह खंडित हो चुकी होती.’’ वे आगे कहते हैं कि मोटे तौर पर ”यात्रा ने तीन काम किए हैं. पहला, इसने हर क्षेत्र में कांग्रेस संगठन और कार्यकर्ताओं में नई जान फूंक दी है. दूसरा, भाजपा की हिंदुत्व विचारधारा का विरोध करने वाले सिविल सोसाइटी के लोगों ने कांग्रेस को गंभीरता से लेना शुरू कर दिया है.

तीसरा, राहुल गांधी की व्यक्तिगत छवि में बड़ा बदलाव आया है. उन्हें अब महज ऐसे सियासी वारिस, और अहंकारी इंसान के तौर पर नहीं देखा जा रहा जिसे भारत की कोई समझ नहीं है.’’ हालांकि, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) के फेलो और अशोका यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग में विजिटिंग असिस्टेंट प्रोफेसर राहुल वर्मा इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं. उनकी राय है कि यात्रा का असर सिर्फ राहुल गांधी की नकारात्मक छवि को खत्म करने तक ही सीमित रहा है.

यात्रा के हासिल 
सी-वोटर का सर्वेक्षण बताता है कि यात्रा के बाद राहुल की छवि में सुधार हुआ है. सी-वोटर ने यात्रा से पहले और बाद, राज्यों में राहुल की रेटिंग पर नजर रखी थी. सर्वे में शामिल लोगों से पूछा गया कि क्या वे उनके राजनैतिक प्रदर्शन से संतुष्ट हैं? तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां राहुल को पहले से ही 55 प्रतिशत से लेकर 62 प्रतिशत तक उच्च रेटिंग प्राप्त थी, उनकी लोकप्रियता स्थिर रही और बढ़ी है. हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों में, जहां उनकी रेटिंग औसतन 40 प्रतिशत थी, वहां यात्रा के बाद रेटिंग क्रमश: छह और आठ प्रतिशत अंक तक बढ़ गई. हालांकि, राजस्थान, दिल्ली, यूपी और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में जहां उनकी रेटिंग कम थी, वहां मामूली बढ़त हुई है.

राहुल के लिए अच्छी खबर यह है कि जनवरी 2023 में उनकी अखिल भारतीय रेटिंग 50 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जो जनवरी 2022 की तुलना में 10 प्रतिशत अंकों की प्रभावशाली वृद्धि है. हालांकि अभी भी यह जनवरी 2019 में उनके 54.5 प्रतिशत के उच्चतम स्तर से कम है. जब लोगों से पूछा गया कि नरेंद्र मोदी या राहुल गांधी में से प्रधानमंत्री बनने के लिए कौन बेहतर है तो यात्रा के बाद एक गंभीर निष्कर्ष यह भी रहा कि प्रधानमंत्री की रेटिंग 54.3 प्रतिशत से बढ़कर 60.8 प्रतिशत हो गई जबकि राहुल की रेटिंग बहुत मामूली वृद्धि के साथ मात्र 29.9 प्रतिशत रही जो उनके और मोदी के बीच बड़ी लोकप्रियता के बड़े अंतर को दर्शाता है.

और जैसा कि सी-वोटर के संस्थापक अध्यक्ष, यशवंत देशमुख बताते हैं, ”2019 में राहुल गांधी उच्च रेटिंग के साथ भी, कांग्रेस को आम चुनाव में जीत नहीं दिला सके या यहां तक कि भाजपा को महत्वपूर्ण चुनौती भी नहीं दे सके.’’ उनका मानना है कि इस यात्रा का सरोकार 2024 में भाजपा को हराने से नहीं है बल्कि यह तो अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप के उछाल से कांग्रेस के लिए पैदा हो रहे खतरे को कम करने और इस तथ्य को मजबूत करने के लिए थी कि कांग्रेस देश में प्रमुख विपक्षी दल बनी हुई है.

इंडिया टुडे-सी-वोटर के देश का मिजाज सर्वेक्षण में जब लोगों से भारत जोड़ो यात्रा का आकलन करने के लिए कहा गया, तो 29 प्रतिशत लोगों ने माना कि यह जनसंपर्क के लिए कांग्रेस का एक व्यापक अभ्यास था. लेकिन 36.8 प्रतिशत लोगों ने माना कि यात्रा ने हलचल पैदा की थी लेकिन पार्टी के पास चुनाव जीतने के लिए आवश्यक संगठनात्मक शक्ति और नेतृत्व नहीं है. संदेश स्पष्ट है: अगर कांग्रेस को राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा को चुनौती देनी है तो उसे बड़े पैमाने पर सांगठनिक बदलाव करने होंगे. दिग्विजय सिंह कहते हैं, ”कांग्रेस हमेशा आंदोलनों की पार्टी रही है, कार्यकर्ताओं की नहीं. किसी भी सफल आंदोलन को एक प्रभावी संगठन से अतिरिक्त शक्ति प्रदान किया जाना चाहिए.’’ 

कांग्रेस के लिए असली चुनौती 30 जनवरी को यात्रा समाप्त होने के बाद शुरू होगी. उसे न केवल उस गति को बनाए रखना होगा जो उसने पैदा की है बल्कि आगे उसे बढ़ाना भी है. खास तौर जब उसे उस प्रभावशाली भाजपा से मुकाबला करना है जो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में अजेय बन गई है. इसकी अहमियत समझते हुए, कांग्रेस 26 जनवरी से 26 मार्च तक ‘हाथ से हाथ जोड़ो’ अभियान शुरू कर रही है.

भारत जोड़ो यात्रा के संदेश को आगे बढ़ाने के इरादे से शुरू होने वाले इस अभियान में पार्टी कार्यकर्ता एकजुट होकर देश भर में 2,30,000 ग्राम पंचायतों, 6,00,000 गांवों और 10 लाख चुनावी बूथ को कवर करेंगे. हालांकि, एक्सिस माई इंडिया के संस्थापक प्रदीप गुप्ता कांग्रेस को यात्रा के बाद किसी तुरत-फुरत परिणाम की अपेक्षा रखने से आगाह करते हैं. गुप्ता कहते हैं, ”यात्रा ने बीजारोपण कर दिया है. अब कांग्रेस संगठन को इस बीज का पोषण करना चाहिए और यदि उसे यात्रा की फसल उगानी और फिर काटनी तो उसे संगठन में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा.’’

आवश्यकता है: संगठन में व्यापक बदलाव की 
कांग्रेस के अधिकांश दिग्गज इससे सहमत हैं कि यात्रा ने पार्टी कार्यकर्ताओं को उत्साहित किया है-जो मिशन का प्रमुख उद्देश्य है. मध्य प्रदेश के पूर्व सीएम और नौ बार लोकसभा सांसद कमलनाथ कहते हैं, ”मैंने अपने राजनैतिक करियर में कार्यकर्ताओं के बीच ऐसा उत्साह कभी नहीं देखा. यात्रा ने संगठन में अलग तरह की ऊर्जा का संचार किया है.’’ लेकिन पार्टी को अब इस ऊर्जा को बनाए रखने के लिए संगठन का निर्माण करना चाहिए. खडग़े के लिए यह चुनौती होगी. खासकर चुनावी राज्यों में खाली पद भरने की जरूरत है जैसे, राजस्थान की 31 जिला इकाइयों में से 20 बिना अध्यक्ष के कार्य कर रही हैं. 

अब इंतजार फरवरी में रायपुर में होने वाले कांग्रेस के पूर्ण अधिवेशन का है. इस सत्र के बाद नई कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) का गठन किया जाएगा. नई सीडब्ल्यूसी का ढांचा और कार्यशैली कांग्रेस का भविष्य तय करेगी. राहुल वर्मा कहते हैं, ”कांग्रेस को सीडब्ल्यूसी जैसे शीर्ष मंच की संरचना बदलनी चाहिए. अगर यह युवाओं से जुड़ना चाहती है तो पुराने नेताओं के बजाय युवा चेहरों को लेना चाहिए.’’ फिलहाल खड़गे ने महासचिवों और राज्य प्रभारियों को हर महीने 10 दिन अपने कार्य-क्षेत्र में गुजारने और जिला तथा ब्लॉक स्तर पर चीजें दुरुस्त करने का निर्देश दिया है. 4 दिसंबर को पार्टी की स्टीयरिंग कमेटी की बैठक में खड़गे ने पदाधिकारियों से सुधरने या हटने को कह दिया. 

जानकारों का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर पर करीब 20 फीसद वोट शेयर के साथ कांग्रेस की अभी भी अन्य विपक्षी दलों पर बढ़त है. जेएनयू  में सीपीएस के अध्यक्ष, प्रोफेसर नरेंद्र कुमार कहते हैं, ‘‘यात्रा की असली परीक्षा यह है कि क्या वह उस 20 प्रतिशत को बेहतर स्ट्राइक रेट में बदल सकती है, अधिक सीटें जीत सकती है और वोट शेयर में और इजाफा कर सकती है.’’ राहुल गांधी और वरिष्ठ नेताओं को चाहिए कि उन्होंने यात्रा में जो आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक मुद्दे उठाए हैं, अब वे उनके ठोस समाधान सुझाते हुए वैकल्पिक नैरेटिव को अंतिम रूप दें.

मसलन, राहुल ने मोटे तौर पर उन आर्थिक सुधारों के बारे में बात की जिन पर वे ध्यान केंद्रित करेंगे, जिसमें एक ठोस कृषि-प्रसंस्करण नेटवर्क स्थापित करके किसानों की आय को बढ़ाने के अलावा लाखों लोगों को रोजगार देने के लिए कुटीर, लघु और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा देना शामिल है. भाजपा के विकास के दृष्टिकोण को चुनौती देने के लिए कांग्रेस को अब राजनीतिक सुधार के अलावा तेजी से सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए खाका तैयार करने की जरूरत है.

आगामी महीनों में राहुल को राजनैतिक भूमिका निभानी होगी. जयराम इशारा करते हैं, ”राहुलजी ने यात्रा के दौरान अपने लिए वैचारिक और नैतिक भूमिका तय की है, अब उन्हें राजनैतिक भूमिका तय करनी होगी. यह बहुत जरूरी है.’’ हालांकि राहुल ने यात्रा में चुनावी राजनीति से परहेज किया पर कुछ मौकों पर पार्टी के अंदरूनी झगड़े निबटाने का अपना नजरिया पेश किया.

जैसे, कर्नाटक में उन्होंने दो विरोधी नेताओं पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष डी.के. शिवकुमार पर हाथ रखते हुए कहा, ”सिद्धरमैयाजी आप मुझे शिवकुमार जी के दो गुण बताइए और शिवकुमार जी आप मुझे पूर्व मुख्यमंत्री के दो गुण बताइए.’’ इसी तरह उन्होंने राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनके धुर विरोधी सचिन पायलट दोनों को ‘पार्टी के लिए थाती’ बताया. सूत्र बताते हैं कि हरियाणा में 2019 के विपरीत उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को संगठन के मसले और 2024 के चुनाव में टिकट वितरण का काम देखने को कहा है. 

राहुल वर्मा कहते हैं, ”पार्टी 2023 में कुछ महत्वपूर्ण राज्यों को नहीं जीत पाती है, तो यह 2024 के आम चुनाव की लड़ाई में नहीं होगी. बिना किसी महत्वपूर्ण जीत यह खुद को मतदाताओं के सामने खुद एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में नहीं पेश कर सकती और न ही अन्य विपक्षी दल इसकी अगुआई में गठबंधन के साझीदार हो सकते हैं.’’ 

यूपी में, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने कांग्रेस के निमंत्रण के बावजूद यात्रा में शामिल होने से इनकार कर दिया. पार्टी अब विपक्षी एकता के एक बड़े प्रदर्शन का लक्ष्य बना रही है. इसने 30 जनवरी को श्रीनगर में यात्रा के समापन समारोह में शामिल होने के लिए समान विचारधारा वाले 23 दलों के नेताओं को आमंत्रित किया है. उपस्थित नेताओं की सूची जितनी बड़ी होगी, कांग्रेस के लिए विपक्षी एकता की धुरी के रूप में पार्टी की स्वीकृति का संकेत उतना बड़ा होगा. 

वास्तव में, छह राज्यों पर बहुत कुछ निर्भर होगा जहां भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला रहता है—हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और छत्तीसगढ़—में लोकसभा की 100 सीटें हैं. पिछले दो लोकसभा चुनावों में, पार्टी इन 100 सीटों में से केवल तीन सीटें जीत सकी, जो दर्शाता है कि पीएम मोदी और राहुल गांधी के बीच सीधे मुकाबले में राहुल गांधी के लिए बहुत कम मौका बनता है.

योगेंद्र यादव कहते हैं, ”इस देश का भविष्य 2024 के परिणाम से जुड़ा है और 2024 का परिणाम कांग्रेस के प्रदर्शन से जुड़ा है. अगर कांग्रेस इन छह राज्यों में 100 में से कम से कम 30 सीटें जीत पाती है, तो भाजपा बहुमत के निशान तक पहुंचने के लिए भी संघर्ष कर रही होगी.’’ अगर कांग्रेस को फिर से राष्ट्रीय स्तर पर एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनना है तो आगे चलकर इसे छह राजनैतिक रूप से महत्वपूर्ण प्रमुख राज्यों—यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, महाराष्ट्र और तेलंगाना में अपनी किस्मत पलटनी होगा.

कांग्रेस ने कुछ राज्यों में गठबंधन सहयोगियों के हाथों अपनी जमीन गंवा दी है. अगर उसे अतीत की बेड़ियों को तोड़ना है तो उसके लिए मजबूत संगठनात्मक शक्ति का निर्माण करना होगा. यात्रा ने लोगों को जगाया और उनका ध्यान खींचा है. लेकिन यह रुचि तभी बनी रहेगी जब कांग्रेस इसका राजनीतिक लाभ हासिल करे.

—साथ में रोहित परिहार, राहुल नरोन्हा और धवल एस. कुलकर्णी